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Forties अस्पताल की बढ़ेगी मुश्किलें-वरिंदर घुम्मण मामले में आया ये फैसला

BURNING NEWS✍️RAJESH SHARMA

इलाज में लापरवाही से जालंधर के बॉडी बिल्डर वरिंदर घुम्मण की मौत के मामले को लेकर माननीय पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट से आज नया फैसला सामने आया है। जिस फैसले के बाद फोर्टिस अस्पताल की मुश्किलें बढ़ने वाली है।

माननीय हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार की ओर से गठित नए मैडीकल बोर्ड पर स्टेआर्डर जारी करते हुए पंजाब सरकार से 19 मई 2026 को जबाव तलब किया है। राज्य सरकार के खिलाफ दिवंगत घुम्मण के परिजन भुपिंदर सिंह ने माननीय हाईकोर्ट में अपनी वकील मेहर सचदेव के जरिए याचिका दायर की थी और दूसरे मैडीकल बोर्ड के गठन पर ऐतराज पेश किया था। बहस के दौरान सीनियर एडवोकेट मंदीप सिंह सचदेव ने पहले बोर्ड की रिपोर्ट के बाद दूसरे बोर्ड के गठन किए जाने पर पीडि़त पक्ष के सशंय पेश किए।

प्राथमिक सुनवाई के दौरान माननीय जज सुभाष मेहला पर आधारित बैंच ने प्रथम दृष्टतया पाया कि पहले बोर्ड में सात मैंबरों ने मैडीकल दृष्टि से की जांच में यदि पाया कि मरीज की मौत इलाज में लापरवाही से हुई और जिम्मेदार डॉक्टरों को चिन्हित करते रिपोर्ट प्रस्तुत की है, तो ऐसे क्या नए तथ्य सरकार या स्वास्थय विभाग के समक्ष आए जिस आधार पर दूसरा मैडीकल बोर्ड गठित किया गया।

सीनियर एडवोकेट मंदीप सिंह सचदेवा ने यह भी तर्क प्रस्तुत किया कि जिस पर प्रकार पुलिस एक ही मामले की कई बार जांच नहीं कर सकती, ठीक वैसे ही अन्य सरकारी विभागों को भी मल्टीपल जांचों का अधिकार नहीं दिया जा सकता। बहरहाल, राज्य सरकार के वकील ने नोटिस स्वीकार करते हुए समय मांगा और माननीय हाईकोर्ट ने सरकार को पक्ष प्रस्तुत करने का समय देकर अगली सुनवाई से पहले एडवांस कापी याची पक्ष को देने का अंतरिम आदेश जारी किया है।

गौरतलब है कि बॉडी बिल्डर वरिंदर घुम्मण की एक मामूली आपरेशन के दौरान अमृतसर के फोर्टीस अस्पताल में मौत हो गई थी। परिजनों के शोर मचाने पर CIVIL SURGEON ने मैडीकल बोर्ड का गठन किया गया था। पहले सात सदस्यीय मैडीकल बोर्ड की ओर से फोर्टीज अस्पताल के चार डाक्टरों तपिश शुक्ला, अलका तिवारी, राजेंन्द्र कौल तथा अरुण कुमार चोपड़ा के खिलाफ इलाज में लापरवाही बरतने की रिपोर्ट मिलने के बाद पुलिस ने इन चारों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

संभवत: प्रभावशाली अस्पताल मैनेजमैंट या फिर आरोपी डॉक्टर पक्ष स्तर द्वारा DIRECTOR HEALTH पर दबाव बनाकर दोबारा बोर्ड का गठन करवाया गया और 15 दिनों में रिपोर्ट पेश करने का आदेश जारी किया गया था। इस पर सशंय जताते हुए पीडि़त परिवार ने पहले राज्य सरकार के समक्ष आपत्ति दर्ज करवाई थी जिसके बाद सुनवाई न होने पर माननीय हाईकोर्ट का रूख किया।